Followers

Showing posts with label गजल. Show all posts
Showing posts with label गजल. Show all posts

Monday, July 8, 2019

गजल

ले के सहारा झूठ का सुल्तान बन गए
ज्यों ताज सिर पे आ गया हैवान बन गए।

आवाम के जज़्बात की तो कद्र ही नहीं
लाठी उठाई हाथ में भगवान बन गए।

सब को बड़ी उम्मीद थी फस्लेबहार की
सपनों के सब्जेबाग़ अब वीरान बन गए।

घर में हमारे आग के शोले भड़क उठे
उनको किया जो इत्तिला नादान बन गए।

किस्मत में तेरी गम लिखा है भोग ले "अरुण"
गदहे भी अब के दौर में विद्वान बन गए।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

Sunday, July 15, 2018

"कहाँ खजाना गड़ा हुआ है" ?


गजल -

सत्य जेल में पड़ा हुआ है
झूठ द्वार पर खड़ा हुआ है।।

बाँट रहा वह किसकी दौलत
कहाँ खजाना गड़ा हुआ है।।

उस दामन का दाग दिखे क्या
जिस पर हीरा जड़ा हुआ है।।

अब उससे उम्मीदें कैसी
वह तो चिकना घड़ा हुआ है।।

पाप कमाई, बाप कमाए
बेटा खाकर बड़ा हुआ है।।

लोकतंत्र का पेड़ अभागा
पत्ता पता झड़ा हुआ है।।

सत्ता का फल दिखता सुंदर
पर भीतर से सड़ा हुआ है।।

नर्म मुलायम दिल बेचारा
ठोकर खाकर कड़ा हुआ है।।

उसे राष्ट्रद्रोही बतला दो
"अरुण" अभी तक अड़ा हुआ है।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़