Followers

Showing posts with label अरुण. Show all posts
Showing posts with label अरुण. Show all posts

Tuesday, September 11, 2012

कुण्डलिया


कुण्डलिया  1. – “ अम्बर ”

आगे  तीनों लोक  के , अम्बर का  विस्तार
मंदाकिनियाँ  हैं   कई , धारे  अरुण हजार
धारे अरुण हजार , ऋषि गुनी  कहे अनंता
अम्बर का  विस्तार  , जान पाये  नहि संता
कितने  ही  ब्रम्हाण्ड  , सतत  हैं  दौड़े भागे
अम्बर  का  विस्तार , तीन लोकों के  आगे  |

कुण्डलिया  2. –  “ रवि “

जलना रवि का धर्म है  , लेकिन यह सत्कर्म
संचालित   है   सृष्टि  में  ,  इससे  जीवन मर्म
इससे  जीवन  मर्म , करे  जग को आलोकित
वन  जन  जंतु  जहान  ,  इसी  से  हैं  स्पंदित
सिर्फ दृष्टि भ्रम एक, अरुण का उगना ढलना
लेकिन  यह सत्कर्म , धर्म है रवि का जलना  |

[कुण्डलिया छंद –  इसमें छ: पंक्तियाँ होती हैं . प्रथम शब्द ही अंतिम शब्द होता है. शुरु की दो पंक्तियाँ दोहा होती हैं अर्थात 13 ,11 मात्राएँ .अंत में एक गुरु और एक लघु.
अंतिम चार पंक्तियाँ रोला होती हैं अर्थात 11 ,13 मात्राएँ. दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है .]

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (म.प्र.)