Followers

Wednesday, April 22, 2020

"पृथ्वी दिवस - अर्थ डे"

"पृथ्वी दिवस - अर्थ डे"

हरी भरी वसुंधरा पर नीला नीला ये गगन
कि जिसपे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएँ देखो रंग भरी चमक रहीं उमंग भरी
ये किसने फूल फूल से किया श्रृंगार है
ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार ?
(भरत व्यास)

नील गगन के तले, धरती का प्यार पले
(साहिर लुधियानवी)

वसुन्धरा अर्थात पृथ्वी पर कितने सुंदर गीत लिखे गए हैं। साहित्य जगत में भी सेनापति से लेकर सुमित्रानंदन पंत तक वसुंधरा का सौंदर्य कविताओं में ढल कर प्रवाहित होता रहा। आज प्रदूषण ने गगन के नीले रंग को धूमिल कर दिया। अवैध अंधाधुन्ध कटाई ने हरियाली छीन ली। नदियों का निर्मल नीर कारखानों के अपशिष्ट और रसायनों से दूषित हो गया। शीतल पवन में जहरीली गैसें घुल गईं।प्राकृतिक सौंदर्य ही विलुप्त होता जा रहा है तो आज के कवि प्रकृति चित्रण कैसे कर पाएंगे। इससे भी पहले यह प्रश्न मन में उठता है कि कवि ही क्या, अन्य जीव जन्तु अपना अस्तित्व बचा पाएंगे ?

पहले पर्व और उत्सव मनाए जाते थे। हर्षोल्लास का वातावरण बन जाया करता था। जीवन को ऊर्जा मिलती थी। अब “दिवस” मनाने का चलन आ गया। 364 दिन सोने के बाद एक दिन जागरण के नाम कर दिया। मातृ-दिवस, पितृ-दिवस, प्रेम-दिवस, पर्यावरण-दिवस, राजभाषा-दिवस, पृथ्वी-दिवस आदि आदि। अर्थात जिसके दिवस पूरे होने लगे उसके नाम से एक दिवस बनने लगा। जागरूकता के लिए जरूरी भी है लेकिन क्या एक दिन की जागरूकता से कुछ होने वाला है?

सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की अनुपम रचना है पृथ्वी और इस पृथ्वी की अनुपम रचना है मनुष्य। करोड़ों प्राणियों में एक मात्र मनुष्य ही वह प्राणी है जिसने पृथ्वी को अपने  स्वार्थ के लिए खतरे में डाल दिया। वह भूल रहा है कि उसके कर्मों को उसकी आने वाली पीढ़ियाँ ही भुगतेंगी। “अर्थ” के लोभ में प्रकृति का दोहन। यह लोभ ही अर्थ-डे को अनर्थ-डे बना रहा है। हर मनुष्य दोषी है। हर मनुष्य कुछ न कुछ खिलवाड़ करने पर तुला है। माना कि हर मनुष्य पेड़ नहीं काट रहा है लेकिन पॉलिथीन तो उपयोग में ला रहा है। कहीं रासायनिक उर्वरक, भूमि की उर्वरकता को नष्ट कर रहे हैं तो कहीं कीट नाशकों के प्रयोग से निरीह जीव जंतु लुप्त हो रहे हैं।

सृष्टि का अपना अलिखित अनुशासन है। ग्रह और नक्षत्र अपनी निश्चित दूरी में अपने निश्चित परिपथ में भ्रमण करते हैं। ऋतुएँ स्वतः बदलती जाती हैं। कोई प्राणप्रद वायु उत्सर्जित कर रहा है तो कोई कार्बन डाई ऑक्साइड अवशोषित कर रहा है। प्रकृति प्रदत्त ओजोन परत बनी है। नैसर्गिक प्रकृति संतुलन बना हुआ है लेकिन मनुष्य इस संतुलन को बिगाड़ते जा रहा है। वन के निवासी तो निजी आवश्यकता के लिए एकाध वृक्ष को काटते हैं लेकिन जंगल के जंगल कौन काट रहा है ? इन ठेकेदारों को किनकी शह मिली है? नदियों के किनारे कटते और पटते जा रहे हैं। खेतों में बिल्डिंग बन रही हैं। गाँवों और जंगलों को उजाड़ कर कारखाने लगाए जा रहे हैं। आखिर किसकी शह पर?

यह धरती कितना देती है….इस कविता में कवि ने बचपन में पैसे बोए थे। बचपन अबोध था। लेकिन पैसों के कारण आज धरती का दोहन करने वाले तो अबोध नहीं हैं। क्यों इन पर अंकुश नहीं रखा जा रहा है ? जल, थल और नभ तीनों जगह तो संतुलन बिगड़ता जा रहा है। बालाघाट के मरहूम शायर हबीबुर्रहमान की ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

काटने वाले दरख्तों के न पहचाने गए
और सजा पा गई कुछ तीलियाँ ढोने वाली।।

क्या यह शेर आज भी प्रासंगिक नहीं है ?

धमतरी के मरहूम शायर मुकीम भारती के शेर की प्रासंगिकता देखिए -

मैं दरख़्त हूँ सूखा, हो सके तो पानी दो
आने वाले मौसम में, रह गया तो फल दूंगा।।

क्या चुनावी घोषणा पत्रों में पृथ्वी-संरक्षण का एक बिंदु कभी कोई शामिल कर पायेगा ? रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत तब तक ही है जब तक यह पृथ्वी है।
पृथ्वी-दिवस के अलावा और भी अन्य दिनों में इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश कीजियेगा।

अन्त में मेरी एक कविता की चार पंक्तियाँ -

आने वाले कल से छीनी , तू ने कलसे की हर प्यास
आज मनाता जल से जलसे, कल की पीढ़ी खड़ी उदास।

कौन करेगा अर्पण-तर्पण , कौन करेगा तुझको याद?
पीढ़ी ही जब नहीं रहेगी, कौन सुनेगा तब फरियाद ?

“अरुण कुमार निगम”
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

1 comment:

  1. पृथ्वी दिवस को सार्थक करता सुन्दर पोस्ट।

    ReplyDelete