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Wednesday, July 28, 2021

"विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस"- एक चिन्तन दिवस

 "विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस"- एक चिन्तन दिवस


                             "सावन"


देखो सावन की कंजूसी, गिन-गिन कर बूँदें बाँट रहा।

कुछ नगर-गाँव को छोड़ रहा, चुन-चुन अंचल को छाँट रहा।।


सौदामिनी रूठी बैठी है, बदली सिमटी सकुचायी है।

हतप्रभ है मेंढक की टोली, मोरों की शामत आयी है।।


गुमसुम-गुमसुम है पपीहरा, झींगुर के मुख पर ताले हैं।

अनमनी खेत की मेड़ें हैं, कृषकों के दिल पर छाले हैं।।


इस नन्हीं-मुन्नी रिमझिम में, कैसे हो काम बियासी का।

अब के सावन का रूखापन, है कारण बना उदासी का।।


मत छेड़ प्रकृति के वैभव को, मत कर मानव यूँ मनमानी।

अस्तित्व रहेगा शेष नहीं, यदि रूठ गयी बरखा-रानी।।


अपना महत्व बतलाने को, संकेतों में समझाने को।

शायद यह सावन आया है, बस शिष्टाचार निभाने को।।


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर दुर्ग, छत्तीसगढ़

Saturday, July 24, 2021

गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ

 


रोला छन्द - गुरु


गुरु की महिमा जान, शरण में गुरु की जाओ।

जीवन बड़ा अमोल, इसे मत व्यर्थ गँवाओ।।

दूर करे अज्ञान, वही गुरुवर कहलाये।

हरि से पहले नाम, हमेशा गुरु का आये।। 


अरुण कुमार निगम

Thursday, July 22, 2021

ग़ज़ल : देखो तो !!

 देखो तो !!!!!!!!!


आकाओं ने दिया निमंत्रण, बिना विचारे; देखो तो !

पूँजीवादी परम्परा ने, पैर पसारे; देखो तो !


किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी हो, जनता गजट-बजट पलटे

पूँजीपतियों की चाँदी है, साँझ-सकारे; देखो तो !


गैस रसोई की तन-तन कर, गृहिणी को ताने मारे

डीजल औ' पेट्रोल दिखाते, दिन में तारे; देखो तो !


निजी अस्पतालों के मालिक, दोहरे होकर बैठे हैं

दया-हीन इन संस्थाओं के, वारे-न्यारे; देखो तो !


जिनके सीने में पत्थर हैं, उनसे कैसे कहे "अरुण"

निर्धन की आँखों से बहते, आँसू खारे; देखो तो!


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर दुर्ग, छत्तीसगढ़

Friday, July 16, 2021

"छत्तीसगढ़ की गजलें"

 मेरी नज़र में…….

संकलन - "छत्तीसगढ़ की गजलें"

संपादक - श्री रामेश्वर वैष्णव

प्रकाशक - समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद




प्रकाशन वर्ष - 2019


साहित्य के दो अंग है, गद्य और पद्य। पद्य में छन्द और ग़ज़ल, ये दो ही विधाएँ ऐसी हैं जो शास्त्र-आधारित हैं। इन विधाओं के आधार है, छन्द शास्त्र और ग़ज़ल का अरूज़। दोनों ही विधाओं का अपना एक पूर्व-निर्धारित विधान होता है जिसका पालन करते हुए रचनाएँ की जाती हैं। यह विधान बंधन-सा प्रतीत होता है किंतु यह बंधन नहीं अपितु अनुशासन होता है। इसी अनुशासन के कारण दोनों ही विधाओं में बरसों पूर्व लिखी गयी रचनाएँ आज भी लोकप्रिय हैं। 


गजल की विधा अरबी, फारसी और उर्दू से होती हुई भारतीय भाषाओं तक पहुँची। शब्दों की क्लिष्टता धीरे-धीरे बोलचाल के शब्दों में ढलने लगी। हिन्दी फिल्मों ने ग़ज़लों को लोकप्रिय बनाने की पहल की लेकिन सामान्यतः लोग इन्हें फिल्मी गीत ही समझते रहे। रेडियो सिलोन और विविध भारती ने गैर फिल्मी गजलों को काफी हद तक लोकप्रिय बनाया फिर भी यह प्रयास विशिष्ट वर्ग के श्रोताओं तक सीमित रहा। जब जगजीत सिंह की गैरफिल्मी ग़ज़लों के रिकार्ड बाजार में आये तब गजलें गाँवों, कस्बों, शहरों और महानगरों के चप्पे-चप्पे में गूँजने लगीं। कैसेट के आ जाने से तो ग़ज़लें घर-घर तक पहुँच गईं। जगजीत सिंह की लोकप्रियता से उस दौर में मेहंदी हसन, गुलाम अली, पंकज उदास, चंदन दास आदि की गजलों ने धूम मचा दी। भजन गायक अनूप जलोटा ने भी गजलें गानी शुरू कर दी। 


साहित्य के क्षेत्र में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने और जनमानस तक पहुँचाने का श्रेय दुष्यन्त कुमार को जाता है। उन्हें हिन्दी गजलों का जनक भी कहा जाता है। दुष्यन्त कुमार ने न केवल सरल व बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया बल्कि गजल की परंपरागत विषय-वस्तु से हट कर ऐसी विषय-वस्तु को चुना जो जन-मानस की रोजमर्रा की जिंदगी से काफी करीब से जुड़ी रही हैं। वर्तमान समय की विसंगतियाँ, सामाजिक सरोकार जैसे विषयों में लिखी गयी हिन्दी गजलें जनमानस को झकझोरने लगीं। गजल लिखने वालों की संख्या बढ़ी और गजलों के संग्रह और संकलन प्रकाशित होने लगे। 


किसी संकलन के संपादन का कार्य श्रम-साध्य कार्य होता है और यदि वह संकलन किसी विधा-विशेष की रचनाओं का हो तब वह और भी अधिक कठिन हो जाता है। विधा-विशेष के रचनाकारों की सूची तैयार कर सुपात्र का चयन, उनके पास व्यक्तिगत रूप से जाना या उनके संपर्क नम्बर प्राप्त कर संपर्क करना, उनकी रचनाएँ प्राप्त करना, उन रचनाओं का संपादन करना, उनका क्रम निर्धारित करके उसे प्रकाशक को सौंपना फिर प्रूफ-राइडिंग। ऐसी अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना बहुत आसान नहीं होता है। इस कार्य में श्रम लगता है, समय लगता है, धन लगता है, धैर्य लगता है। किसी संपादक की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने कभी किसी विधा-विशेष पर आधारित संकलन का संपादन किया हो। 


अंचल के वरिष्ठ कवि और गजलकार श्री रामेश्वर वैष्णव जी ने उम्र के इस पड़ाव में युवकों जैसा उत्साह दिखाते हुए इस बात को प्रमाणित कर दिया कि किसी कार्य के प्रति लगन और निष्ठा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। इस दुरूह कार्य के सफल निष्पादन हेतु मैं श्री रामेश्वर वैष्णव जी को शुभकामनाएँ देता हूँ। 


उनके कुशल  संपादन में संकलन "छत्तीसगढ़ की गजलें" आज पुस्तकाकार में उपलब्ध हैं। इसके प्रकाशक समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद हैं। पुस्तक आकर्षक कलेवर में है। कागज व छपाई भी गुणवत्तापूर्ण है। नयनाभिराम आवरण शशि ने तैयार किया है तथा श्री अनिरुद्ध सिन्हा ने "आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल-शिल्प और कथ्य" शीर्षक से सार्थक भूमिका लिखी है। चयनित गजलों में यथासंभव हिन्दीनिष्ठता का ध्यान रखा गया है। 


इस संकलन में छत्तीसगढ़ के चौबीस गजलकारों की गजलों का संकलन है। प्रत्येक गजलकार की चार से पाँच गजलें इसमें संकलित की गयी हैं। गजलों की संख्या अधिक होने के कारण प्रत्येक गजलकार का केवल एक प्रतिनिधि शेर यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। परखने के लिए तो चावल का एक दाना ही पर्याप्त होता है। हाथ कंगन को आरसी क्या? "छत्तीसगढ़ की गजलें" संकलन की एक झलक सुधि-पाठकों के लिए प्रस्तुत है -


दोष इसका दोष उसका मूल बातें गौण सारी

तालियाँ जब तक बजेंगी चोंचले होते रहेंगे।

(अरुण कुमार निगम)


कौन कर पाएगा तेरे प्रश्न हल 

अपने प्रश्नों के स्वयं उत्तर बना।

(अशोक कुमार नीरद)


चटपटी हैं अटपटी हैं या फकत अफवाह हैं 

बस खबर जी अब नहीं हैं आजकल अखबार में।

(अशोक शर्मा)


वहाँ गजल के शेर कैसे अपनी बात कहें 

जहाँ की महफ़िल वाचालों ने सजाई हैं।

(आलोक शर्मा)


मेरी ग़ज़ल कहानी भी है 

आग भी है तो पानी भी है।

(डॉक्टर चितरंजन कर)


शक्ल हर एक की बताती है 

वायु में ही घुला जहर होगा।

(देवधर महंत)


कितने मासूमों को दंगों के हवाले करके 

फिर शिकारी मचान पर है ग़ज़ल कहने दो।

(घनश्याम शर्मा)


जो शब्दों की जलेबी बेचता फिरता सभाओं में 

वह होगा कोई हलवाई या कोई मसखरा होगा।

(जीवन यदु)


मिल जाए बस आराम से दो वक्त की रोटी 

मैं तुझसे हुकूमत तो नहीं माँग रहा हूँ।

(काविश हैदरी)


ऊँचे मुक्त गगन में उड़ते देख खुशी ही होती है 

हाथ पकड़कर कलम चलाना हमने उन्हें सिखाया है।

(महेश कुमार शर्मा)


आपको अच्छा नहीं लगता करूँ क्या 

यह मेरा अंदाज है अभिनय नहीं है। 

(डॉक्टर माणिक विश्वकर्मा नवरंग)


आपसे दिल की बात कर डाली 

और दे दी किताब की सूरत।

(मीना शर्मा मीन)


देश का यौवन यहाँ लंबे समय से 

सह रहा संत्रास फिर भी लोग चुप हैं।

(मुकुंद कौशल)


घर का भेदी संसद में 

घर में शकुनि मामा क्यों।

(नरेंद्र मिश्र धड़कन)


मजबूर पर क्यों हँसता है क्यों कसता है फिक्रे 

लगता है कि गर्दिश ने तेरा घर नहीं देखा।

(डॉक्टर नौशाद अहमद सिद्दीकी)


प्यार की मंडी में जब कोहराम होता है बहुत 

इक ग़ज़ल सुनकर मेरी अक्सर बहल जाते हैं लोग।

(रामेश्वर शर्मा)


कोई आकाश से फरिश्ता नहीं आएगा 

होना है तुम से ही उद्धार तुम चलो तो सही।

(रामेश्वर वैष्णव)


आवाम को कई तरह से बाँटकर अलग-अलग 

यह एक जैसे दिख रहे हैं हुकमराँ जुदा-जुदा।

(रंजीत भट्टाचार्य)

 

रहा गीत संगीत से जिसका नाता नहीं कभी कोई 

उसके आगे जान बूझकर अपनी बीन बजाओ मत।

(संतोष झांझी)


वैलेंटाइन जब से आया 

तब से ढाई आखर बदले।

(सतीश कुमार सिंह)


शब्द खोखले हो जाएंगे 

अपनों से अभिनय मत करना।

(श्याम कश्यप बेचैन)


जिंदगी में कामयाबी के लिए 

ख्वाब पलकों पर सजाना चाहिए। 

(सुखनवर हुसैन)


हिटलर या कि सिकंदर जितनी ताकत का वरदान न दे

सच को सच कहने का साहस हो इतना बलवान बना।

(विजय राठौर)


अमीरों के हक में हैं मैदान सारे 

और फुटपाथ पर मुफलिसी खेलती है।

(युसूफ सागर)


प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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Tuesday, May 25, 2021

 गीत - "क्या जाने कितने दिन बाकी"


क्या जाने कितने दिन बाकी

छक कर आज पिला दे साकी।।


आगे पीछे चले गए सब, मधुशाला में आने वाले

धीरे-धीरे मौन हो गए, झूम-झूम के गाने वाले।

अपनी बारी की चाहत में, बैठा हूँ मैं भी एकाकी।।

क्या जाने कितने दिन बाकी

छक कर आज पिला दे साकी।।


जाने वाले हर साथी को, घर तक है मैंने पहुँचाया

जर्जर काया पग डगमग थे, फिर भी मैंने फर्ज निभाया।

आने वाले को जाना है, रीत यही तो है दुनिया की।।

क्या जाने कितने दिन बाकी

छक कर आज पिला दे साकी।।


गीतकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग. छत्तीसगढ़

Tuesday, February 2, 2021

"वासंती फरवरी"

 "वासंती फरवरी"


कम-उम्र बदन से छरहरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


शायर कवियों का दिल लेकर

शब्दों का मलयानिल लेकर

गाती है करमा ब्याह-गीत

पंथी पंडवानी भरथरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


गुल में गुलाब का दिवस लिए

इक प्रेम-दिवस भी सरस लिए

है पर्यावरण प्रदूषित पर

बातें इसकी हैं मदभरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


इसकी भी अपनी हस्ती है

इसमें मेलों की मस्ती है

नमकीन मधुर कुछ खटमीठी

थोड़ी तीखी कुछ चरपरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


यह बारह भाई-बहनों में

इकलौती सजती गहनों में

यूँ आती यूँ चल देती है

बस नजर डाल कर सरसरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


सुख शेष कहाँ अब जीवन में

घुट रही साँस वातायन में

कुछ राहत सी दे जाती है

बन स्वप्न-लोक की जलपरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग

छत्तीसगढ़

Saturday, August 1, 2020

"मोर संग चलव........" (भाग - 2)


#  मधुर छत्तीसगढ़ी गीतों का स्वर्णिम इतिहास #

"मोर संग चलव........" (भाग - 2)

मोर संग चलव श्रृंखला भाग 1 के अंत में मैंने लिखा था -

"मोर संग चलव" गीत ने वर्ष 1982 में छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत को न केवल  छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव तक पहुँचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभायी बल्कि देश की सीमाओं से दूर सात समुन्दर पार तक पहुँचा दिया।

आइए आज बताता हूँ कि 1982 में ऐसी कौन सी क्रांति हुई थी जिसके कारण छत्तीसगढ़ी गीत और संगीत छत्तीसगढ़ के गाँव से लेकर सात समुन्दर पार तक गूँज उठा था।

दुर्ग निवासी ताज अली थारानी जी, जिनके परिवार की गाँधी चौक दुर्ग में एच एम वी, पॉलीडोर आदि रिकार्ड्स की डीलरशिप थी, "मोर संग चलव" गीत के दीवाने थे। उन्होंने लक्ष्मण मस्तुरिया जी से मुलाकात करके इस गीत के साथ ही कुछ और छत्तीसगढ़ी गीतों के रिकार्ड्स बनाने की इच्छा जाहिर की। मस्तुरिया जी ने कहा कि विचार अच्छा है, मेरी सहमति भी है चलिए (मोर संग चलव) इस संदर्भ में चंदैनी गोंदा के संस्थापक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी से चर्चा कर लेते हैं। लक्ष्मण मस्तुरिया जी के साथ थारानी जी दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के पास गए। उन्होंने भी प्रस्ताव पर अपनी सहमति प्रदान कर दी। इस तरह से पॉलीडोर जो म्यूज़िक इंडिया कंपनी बन चुकी थी, के स्टूडियो में लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीतों का पहला ई.पी. रिकॉर्ड तैयार हुआ।

आप में से बहुत से मित्र जानते ही होंगे कि पहले 78 स्पीड के तवे हुआ करते थे जिनके एक साइड में एक गीत और दूसरी साइड में एक गीत अर्थात एक तवे में कुल दो गीत हुआ करते थे। ग्रामोफोन चाबी वाला हुआ करता था और लोहे की नुकीली निडिल होती थी। बाद में इलेक्ट्रिक मोटर वाले रिकॉर्ड प्लेयर आ गए जिसमें क्वार्ट्ज़ की निडिल हुआ करती थी। इन रिकॉर्ड प्लेयर्स के साथ ही 45 आरपीएम स्पीड के ई पी रिकॉर्ड बनने लगे थे जिनके प्रत्येक साइड में दो गाने अर्थात एक रिकॉर्ड में कुल 4 गाने होते थे। इससे बड़े आकार के रिकॉर्ड माने एल पी रिकॉर्ड भी बनने लगे थे जिनकी स्पीड 33 आरपीएम हुआ करती थी। एक एल पी रिकॉर्ड के प्रत्येक साइड में 6 गीत अर्थात कुल 12 गीत हुआ करते थे। सन् 1982 में इलेक्ट्रिक मोटर वाले रिकॉर्ड प्लेयर और ई पी, एल पी रिकार्ड्स (तवा) का प्रचलन हो चुका था। लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत ई पी रिकार्ड्स में ही बने थे।

हाँ तो मैं बता रहा था कि म्यूज़िक इंडिया कम्पनी द्वारा जारी, लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीतों का पहला रिकॉर्ड ई पी रिकॉर्ड था जिसके साइड A में "मोर संग चलव" और साइड B में दो गीत क्रमशः "पता दे जा रे, पता ले जा रे गाड़ी वाला" और "हम तोरे सँगवारी कबीरा हो, हम तोरे सँगवारी" था। मोर संग चलव गीत के गायक स्वयं लक्ष्मण मस्तुरिया थे। गीत लंबा होने के कारण साइड A में यही इकलौता गीत है। साइड B  के पहले गीत "पता दे जा रे, पता ले जा रे गाड़ी वाला" को गायिका कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) ने स्वर दिया था। म्यूज़िक इंडिया कं. द्वारा यह रिकॉर्ड लॉन्च होते ही इस गीत का प्रसारण बी बी सी लंदन से हुआ और हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा सात समुन्दर पार से सम्पूर्ण विश्व में गूँज उठी। तब से आज तक यही गीत कविता वासनिक का मास्टर गीत बना हुआ है। साइड B के दूसरे गीत "हम तोरे सँगवारी कबीरा हो" को गायक भैया लाल हेड़ाऊ ने स्वर दिया था। यह गीत आज भी भैयालाल हेड़ाऊ का मास्टर गीत बना हुआ है।

इस प्रथम रिकॉर्ड के तीनों ही गीतों के गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया हैं। संगीतकार हैं खुमान-गिरिजा अर्थात खुमानलाल साव और गिरिजा कुमार सिन्हा। निर्माता कम्पनी है "म्यूज़िक इंडिया लि.। कंपनी द्वारा जारी ई पी रिकॉर्ड का नम्बर है 2222830. इंट्रोड्यूसर - ताज अली थारानी और प्रोड्यूसर - संगीतम, गाँधी चौक दुर्ग। इस प्रथम ई पी रिकॉर्ड का नाम दिया गया - "लक्ष्मण मस्तुरिया के छत्तीसगढ़ी गीत"। यह रिकॉर्ड स्टीरियो साउण्ड में था। रविकान्त वर्मा ने इस रिकॉर्ड का कव्हर पेज बनाया था।

ऐसी ही छोटी-छोटी जानकारियों के कारण आलेख बड़ा हो जा रहा है, इसीलिए इन स्मृतियों को एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि नयी पीढ़ी के लोग इन गीतों के इतिहास के बारे में जान सकें। आप इस श्रृंखला से जुड़े रहिए। प्रत्येक अंक में अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलेंगी।

आलेख - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़