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Sunday, February 22, 2015

कुकुभ छन्द














  

(चित्र ओबीओ से साभार) 
 
कुकुभ छन्द – पहला दृश्य 

एक सरीखी प्रात: संध्या,जीवन की सच्चाई रे
एक सूर्य को आमंत्रण दे , दूजी करे विदाई रे
कालचक्र की आवा-जाही, देती किसे दिखाई रे
तालमेल का ताना-बाना, सुन्दर बुनना भाई रे  

कुकुभ छन्द – दूसरा दृश्य 

दादा  की   बाँहों में  खेले , बड़भागी  वह पोता है
एकल  परिवारों में  पोता , मन ही मन में रोता है
हर घर की यह बात नहीं पर , अक्सर ऐसा होता है
सुविधाओं की दौड़-भाग में,जीवन-सुख क्यों खोता है  

कुकुभ छन्द – तीसरा दृश्य

पोता  कूदे , दादा  थामे , यही  भरोसा  कहलाता
यही भरोसा जोड़े रखता , मन से मन का हर नाता
ना मन में संदेह जरा-सा, और नहीं  डर का साया
देख चित्र को  मेरे मन में , यारों बस इतना आया


अरुण कुमार निगम

Tuesday, January 27, 2015

रूपमाला छन्द :
















रूपमाला छन्द :

एक पटरी सुख कहाती , एक का दुख नाम
किन्तु होती साथ दोनों , सुबह हो या शाम
मिलन इनका दृष्टि-भ्रम है, मत कहो मजबूर
एक  ही  उद्देश्य  इनका , हैं  परस्पर  दूर  

चल रही इन पटरियों पर , जिंदगी की रेल
खेलती  विधुना  हमेशा , धूप - छैंया खेल
साँस के लाखों मुसाफिर, सफर करते नित्य
जानता  आवागमन का  कौन है  औचित्य

अड़चनों की गिट्टियाँ भी , खूब देतीं साथ
लौह-पथ  मजबूत  करने , में बँटाती हाथ
भावनाओं  में  कभी भी , हो नहीं टकराव 
सुख मिले या दुख मिले बस, एक-सा हो भाव

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)  
(ओबीओ चित्र से काव्य तक छन्दोत्सव -45 में सम्मिलित मेरी रचना)
चित्र ओबीओ से साभार

Sunday, January 18, 2015

अच्छे दिन :



अच्छे दिन :
कब लौटेंगे  यारों अपने  , बचपन वाले अच्छे दिन
छईं-छपाक, कागज़ की कश्ती, सावन वाले अच्छे दिन 

गिल्ली-डंडा, लट्टू चकरी , छुवा-छुवौवल, लुकाछिपी
तुलसी-चौरा, गोबर लीपे आँगन वाले अच्छे दिन 

हाफ-पैंट, कपड़े का बस्ता, स्याही की दावात, कलम
शाला की छुट्टी की घंटी, टन-टन वाले अच्छे दिन
 
मोटी रोटी, दाल-भात में देशी घी अपने घर का
नन्हा-पाटा, फुलकाँसे के बरतन वाले अच्छे दिन 

बचपन बीता, सजग हुये कुछ और सँवरना सीख गये
मन को भाते, बहुत सुहाते, दरपन वाले अच्छे दिन 

छुपा छुपाकर नाम हथेली पर लिख-लिख कर मिटा दिया
याद करें तो कसक जगाते, यौवन वाले अच्छे दिन 

निपट निगोड़े सपने सारे , नौकरिया ने निगल लिये
वेतन वाले से अच्छे थे, ठन–ठन वाले अच्छे दिन
 
फिर फेरों के फेरे में पड़ , फिरकी जैसे घूम रहे
मजबूरी में कहते फिरते, बन्धन वाले अच्छे दिन 

दावा वादा व्यर्थ तुम्हारा , बहल नहीं हम पायेंगे
क्या दे पाओगे तुम हमको, बचपन वाले अच्छे दिन
 
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (chhattiछत्तीसगढ़)

Monday, January 12, 2015

अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये......



अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये......

कैसे    कैसे   मंजर    आये   प्राणप्रिये
अपने    सारे    हुये   पराये   प्राणप्रिये |

सच्चे  की  किस्मत  में  तम  ही  आया है
अब  तो  झूठा  तमगे   पाये   प्राणप्रिये |

ज्ञान  भरे  घट  जाने  कितने  दफ्न हुये
अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये |


भूखे - प्यासे  हंसों  ने  दम  तोड़  दिया
अब  कौआ  ही  मोती  खाये  प्राणप्रिये |

यहाँ  राग - दीपक  की  बातें करता था
वहाँ   राग – दरबारी   गाये  प्राणप्रिये |
 
सोने    चाँदी   की   मुद्रायें   लुप्त  हुईं
खोटे  सिक्के  चलन  में  आये  प्राणप्रिये |

सच्चाई   के    पाँव   पड़ी   हैं   जंजीरें
अब तो बस भगवान बचाये  प्राणप्रिये |

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)