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Friday, June 24, 2011

प्यार में हिसाब नहीं जानता.....

हुश्न और शवाब नहीं जानता
प्यार में हिसाब नहीं जानता.

छू लिये थे लब किसी के एक दिन
तब से मैं गुलाब नहीं जानता.

ढाई आखरों में उलझा इस तरह
धर्म की किताब नहीं जानता.

प्यार के नशे में चूर – चूर हूँ
चीज क्या शराब नहीं जानता.

हर सवाल पर न “क्यों” कहा करो
“क्यों” का मैं जवाब नहीं जानता .

-अरुण कुमार निगम
 आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Tuesday, June 21, 2011

मैं केवल उच्चारण हूँ......

मैं क्या था ?
जो हूँ तेरे कारण हूँ.
भाषा है तू
मैं केवल उच्चारण हूँ.

भाव दिये तूने मुझको जब
कवि बना मैं
किरणों का आलोक दिया तब
रवि बना मैं

श्रेष्ठ बनाया तूने
मैं साधारण हूँ.
भाषा है तू
मैं केवल उच्चारण हूँ.

निर्बल था मैं तूने मुझको
सबल बनाया
कीचड़ में पलने वाले को
कमल बनाया

तेरे उत्कट प्रेम का मैं
उदाहरण हूँ.
भाषा है तू
मैं केवल उच्चारण हूँ.

-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग
(छत्तीसगढ़)
(रचना सन्‌ 1983)

Sunday, June 12, 2011

गीत : तुम्हीं प्रेरणा कवि ह्रदय की


तुम्हीं प्रेरणा कवि ह्रदय की
कविता का अधिकार न छीनो
तुम पर ही अब गीत रचूंगा
मुझसे यह अधिकार न छीनो.

सावन बनकर छा जाओगे
ह्रदय पपीहा नृत्य करेगा
घुंघरू तो टकरायेंगे ही
तुम इनकी झंकार न छीनो.

जब ऋतुराज विहँस आयेगा
कलम-कोकिला कूक उठेगी
वरना होगा केवल पतझर
तुम इनका अभिसार न छीनो.

बिना छिद्र बाँसुरिया कैसी
बिना साधना कैसी सरगम
बिना प्रेरणा के कवि कैसा
वीणा से तुम तार न छीनो.

कहीं भावना की आँधी से
सौगंधों का बाँध न टूटे
अरी बावरी ! हठ छोड़ो तुम
जीवन का आधार न छीनो.

कठिन साधना के प्रतिफल में
तुमसे निश्छल प्यार मिला है
जीवन छीनो , धड़कन छीनो
तुम अपना उपहार न छीनो.

जलने दो तुम “अरुण – हृदय” को
तब ही जग आलोकित होगा
आदिकाल से नियति यही है
तुम मेरे संस्कार न छीनो. 

-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग
(छत्तीसगढ़)


(रचना सन्‌ 1977)

Monday, June 6, 2011

विवाह की 29 वीं वर्षगाँठ


अरुण कुमार निगम एवं श्रीमती सपना निगम (विवाह पूर्व मंजु रामटेके) 
विवाह की 29 वीं वर्षगाँठ
मं त्र मुग्ध हूँ मौन अकिंचित , प्यार करो तो जानूँ
जु गनू की शीतल ज्वाला , स्वीकार करो तो जानूँ.
रा स नहीं बनवास नहीं , उन्मुक्त प्रेम हूँ प्रियतम
म न की व्याकुलता से तुम श्रृंगार करो तो जानूँ
टे सू नहीं , दहकता मन है ,मन के मीत सुनो तुम
के श घटा की इस पर तुम , बौछार करो तो जानूँ

अ गर सुखों से प्यार तुम्हें है , साथ ना चल पाओगे
रू प – महल को मेरे कारण , वार करो तो जानूँ
न हीं चाह जीवन-साथी की , तुम जीवन बन जाओ
नि र्धन के उर में रह कर ,अभिसार करो तो जानूँ
ग गन अभागा ऐसा मेरा ,हर क्षण जहाँ अमावस
म नमीता ! यह मावस अंगीकार करो तो जानूँ.

( सन 1982 में लिखी गई कविता )

Sunday, June 5, 2011

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष - "बसंत"


                               -अरुण कुमार निगम

कविता में ,गीत में,  बसंत     नजर आता है.
अब तो बसंत का बस
 ,अंत नजर आता है.

जंगल का नाश हुआ
,    गायब पलाश हुआ
सेमल ने दम तोडा
,   आम भी निराश  हुआ.
चोट
लगी वृक्षों को,     घायल आकाश हुआ.
बादल
भी रो न सका     ,  इतना हताश हुआ 
.
 आधुनिक शहर दिक्-दिगंत नजर आता है.
अब तो बसंत का बस
 , अंत नजर आता है.

सोचो तो
   गए साल   , कैसा  अंजाम  हुआ
बाँझ रही अमराई
  ,  पैदा    न   आम  हुआ.
प्याज ने रुलाया
   तो ऐतिहासिक दाम हुआ
दौलत की लालच
  में  सरसों बदनाम हुआ.

मौसम
   महाजन - -सामंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस
,अंत नजर आता है.

कोयल न कुहुकेगी
,   बुलबुल न चहकेगी
पायल   न
  झनकेगी ,    चूड़ी न खनकेगी
बिंदिया
   न  चमकेगी,     सांसें    न महकेगी
होली
     न  दहकेगी,          गोरी न बहकेगी.

प्रश्न
  भविष्य का,    ज्वलंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस
, अंत नजर आता है.


 
 

Thursday, June 2, 2011

ज़िंदगी

( सन उन्नीस सौ अस्सी में लिखी गई मेरी एक गज़ल )

एक सूखा सा गुलाब ज़िंदगी
आह दर्द का सैलाब ज़िंदगी.

आग में जलता रहे जो उम्र भर
ऐसा रोशन आफ्ताब ज़िंदगी.

बेजुबाँ से पूछिये कुछ भी अगर
खामोशी का है जवाब ज़िंदगी.

एक धोखा खूबसूरत और हसीं
मौत पर लिपटा नकाब ज़िंदगी.

तोड़िये फिर जोड़िये जाने जिगर
किस कदर है बेहिसाब ज़िंदगी.

उम्र के पन्नों पे है लिखी हुई
प्यार की ये एक किताब ज़िंदगी.

दिल की बात खुल के आज लिख ‘अरुण’
जैसी है , है लाजवाब ज़िंदगी.

(कृपया मेरे अन्य ब्लाग्स में भी पधारें तथा छत्तीसगढ़ी को जानें)

-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )    

Saturday, April 2, 2011

चैत की चंदनिया

                       -अरुण कुमार निगम

चादर सी ,चूनर सी-       चैत की चंदनिया
झांझर सी,झूमर सी -     चैत की चंदनिया

महुआ की मधुता सी,  मनभाती-मदमाती
छिटके गुलमोहर सी -    चैत की चंदनिया

अनपढ़ - अनाड़ी सी   ,सल्फी सी-ताड़ी-सी
मादक-सी,मनहर सी -   चैत की चंदनिया

अधपक्की इमली सी  ,खटमिट्ठी -खटमिट्ठी
सरसों सी,सुन्दर सी -     चैत की चंदनिया

मनभाये  बैरी सी ,      अमुआ की कैरी सी
टेसू सी ,सेमर सी -         चैत की चंदनिया

कोयल की कुहु-कुहु सी ,पपीहे की पीहु-पीहु सी
उड़ते कबूतर सी -          चैत की चंदनिया

सतरंगी सपनों सी,      दूर बसे अपनो सी
प्रिय की धरोहर सी -      चैत की चंदनिया

मंगतू की मेहनत सी,    चैतू की चाहत सी
गेहूँ  सी,अरहर सी -        चैत की चंदनिया

हल्बी सी,गोंड़ी सी,   छत्तीसगढ़ी बोली सी
भोले से बस्तर सी -        चैत की चंदनिया

ज्योति की शक्ति सी,भक्तों की भक्ति सी
माता के मंदिर सी -        चैत की चंदनिया

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