हुश्न और शवाब नहीं जानता
प्यार में हिसाब नहीं जानता.
छू लिये थे लब किसी के एक दिन
तब से मैं गुलाब नहीं जानता.
ढाई आखरों में उलझा इस तरह
धर्म की किताब नहीं जानता.
प्यार के नशे में चूर – चूर हूँ
चीज क्या शराब नहीं जानता.
हर सवाल पर न “क्यों” कहा करो
“क्यों” का मैं जवाब नहीं जानता .
-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)