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Thursday, October 7, 2021

महँगाई

 "महँगाई"


पक्ष-विपक्ष के समीकरण में, महँगाई के दो चेहरे हैं 

एक समर्थन में मुस्काता और दूसरे पर पहरे हैं।।


एक राष्ट्र-हित में बतलाता, वहीं दूसरा बहुत त्रस्त है

एक प्रशंसा के पुल बाँधे, दूजे का तो बजट ध्वस्त है।।


रोजगार की बात न पूछो, वह गलियों में भटक रहा है

उसको कल की क्या चिंता है, डीजे धुन पर मटक रहा है।।


उच्च-वर्ग की सजी रसोई, मिडिल क्लास का चौका सूना

कार्पोरेटी रेट बढ़ा कर, कमा रहे हैं हर दिन दूना।।


मध्यम-वर्ग अकेला भोगे, महँगाई की निठुर यातना

कौन यहाँ उसका अपना है, जिसके सम्मुख करे याचना।।


सत्ता-सुख की मदिरा पीकर, मस्त झूमता है सिंहासन

उसे समस्या से क्या लेना, उसको प्यारा केवल शासन।।


अंकुश से है मुक्त तभी तो, सुरसा-सी बढ़ती महँगाई

अंक-गणित, प्रतिशत से बोलो, कभी किसी की हुई भलाई।।


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

3 comments:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (08 -10-2021 ) को 'धान्य से भरपूर, खेतों में झुकी हैं डालियाँ' (चर्चा अंक 4211) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" आज शुक्रवार 08 अक्टूबर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है....  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. मध्यम-वर्ग अकेला भोगे, महँगाई की निठुर यातना
    कौन यहाँ उसका अपना है, जिसके सम्मुख करे याचना।।
    बहुत ही उम्दा व हृदयस्पर्शी रचना

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