"छत्तीसगढ़ी गजल"
करथे अलकरहा बात कभू
दिन ला वो कहिथे रात कभू
जिनगी के पोनी उरकत हे
तँय सूत करम के कात कभू
जिनगी मा तुम पानी राखव
बिन पानी चुरथे भात कभू
का सूरज ऊपर थूकत हव
देखव खुद के औकात कभू
मनखे ला मनखे माने कर
झन पूछ धरम अउ जात कभू
भूतन मन सँग झन बात करव
वो सुधरे हे बिन लात कभू
गुरतुर कविता के संग “अरुण”
लिख दे कर ताते-तात कभू
अरुण कुमार निगम
छत्तीसगढ़