(1)
डूबे मत शिप फ्रेंड की , आओ आज मनायँ
कृष्ण-सुदामा की तरह,मैत्री सभी निभायँ
मैत्री सभी निभायँ , कर्ण को भी मत भूलें
प्रेम त्याग बलिदान , सभी सीमायें छू लें
सिर्फ स्वार्थ के लिये , न हों मन में मंसूबे
अरुण कहे ‘मत कभी,मित्रता नौका डूबे’ ||
(2)
अंधे लँगड़े की कथा , आज आ गई याद
मेला दर्शन का चढ़ा , दोनों को उन्माद
दोनों को उन्माद
, मित्रता उनमें
गहरी
गंगाराम बिन नैन
, पैर बंशी के बैरी
जुगत लगा कर काँध, बिठा बंशी को गंगा
दोनों साथी घूम
, लिये मेला
बहुरंगा ||
(3)
मगरमच्छ अब भी वही ,सुन बंदर नादान
जामुन देना छोड़ दे , मगरमच्छ शैतान
मगरमच्छ शैतान , कलेजा खाने आतुर
मैडम का वह दास, छलेगा तुझको निष्ठुर
नहीं मित्रता इसकी, तुझको रास आयेगी
चालाकी इक रोज, तुझे ही खा जाएगी ||
(सभी चित्र गूगल से साभार)
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भू श्री अपार्ट्मेंट , विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)