-अरुण कुमार निगम
कविता में ,गीत में, बसंत नजर आता है.
अब तो बसंत का बस ,अंत नजर आता है.
जंगल का नाश हुआ , गायब पलाश हुआ
सेमल ने दम तोडा , आम भी निराश हुआ.
चोट लगी वृक्षों को, घायल आकाश हुआ.
बादल भी रो न सका , इतना हताश हुआ
.
आधुनिक शहर दिक्-दिगंत नजर आता है.
अब तो बसंत का बस , अंत नजर आता है.
सोचो तो गए साल , कैसा अंजाम हुआ
बाँझ रही अमराई , पैदा न आम हुआ.
प्याज ने रुलाया तो ऐतिहासिक दाम हुआ
दौलत की लालच में सरसों बदनाम हुआ.
मौसम महाजन - -सामंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस ,अंत नजर आता है.
कोयल न कुहुकेगी , बुलबुल न चहकेगी
पायल न झनकेगी , चूड़ी न खनकेगी
बिंदिया न चमकेगी, सांसें न महकेगी
होली न दहकेगी, गोरी न बहकेगी.
प्रश्न भविष्य का, ज्वलंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस , अंत नजर आता है.
कविता में ,गीत में, बसंत नजर आता है.
अब तो बसंत का बस ,अंत नजर आता है.
जंगल का नाश हुआ , गायब पलाश हुआ
सेमल ने दम तोडा , आम भी निराश हुआ.
चोट लगी वृक्षों को, घायल आकाश हुआ.
बादल भी रो न सका , इतना हताश हुआ
.
आधुनिक शहर दिक्-दिगंत नजर आता है.
अब तो बसंत का बस , अंत नजर आता है.
सोचो तो गए साल , कैसा अंजाम हुआ
बाँझ रही अमराई , पैदा न आम हुआ.
प्याज ने रुलाया तो ऐतिहासिक दाम हुआ
दौलत की लालच में सरसों बदनाम हुआ.
मौसम महाजन - -सामंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस ,अंत नजर आता है.
कोयल न कुहुकेगी , बुलबुल न चहकेगी
पायल न झनकेगी , चूड़ी न खनकेगी
बिंदिया न चमकेगी, सांसें न महकेगी
होली न दहकेगी, गोरी न बहकेगी.
प्रश्न भविष्य का, ज्वलंत नजर आता है
अब तो बसंत का बस , अंत नजर आता है.