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Saturday, January 14, 2012

लगा कर देख ले नादां...........


ना है मंझधार, ना तूफां, मजा क्या ऐसे जीने से.
जिन्हें साहिल की हसरत हो, उतर जाये सफीने से.

कहाँ कोई गुल चढ़ाता है , ये पत्थर की खदानें हैं
गुलाबों की महक आती है,  मेहनत के पसीने से.

कहीं उलझे हुए रिश्ते,  कहीं ज़ुल्फों में खम देखे
सुलझ जाती हैं गाँठें सब, जो सुलझायें करीने से.

ये दौलत दरिया जादू का, पियो तो प्यास बढ़ती है
हमारी प्यास बुझती है  ,  पराये अश्क पीने से.

सभी कुछ पा लिया तूने, सुकूनेदिल नहीं पाया
लगा कर देख ले नादां कभी हमको भी सीने से.

(ओ.बी.ओ.तरही मुशायरा में शामिल)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग  (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

Saturday, January 7, 2012

गज़ल


ये मेहनत गाँव में करते तो अपना घर बना लेते
या  बूढ़े बाप की लाठी को , ताकतवर बना लेते.

इबादत काम की करते औ होता खेत ही मंदिर
कुदाली , हल को अपनी देह का जेवर बना लेते.

अगर  सूखा  पड़ा होता ,  पसीना यूँ बहाते हम
कभी  गेहूँ  बना  देते  , कभी  अरहर  बना लेते.

लुटाते गाँव में खुशियाँ , बहाते प्यार का अमृत
जहर पी -पी के अपने आप को शंकर बना लेते.

सुबह गाते भजन औ रात को कजरी सुनाते हम
अरुण गर शहर ना आते तो अपना घर बना लेते.

("ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में शामिल)

 

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
विजय नगर , जबलपुर ( मध्य प्रदेश )