कुण्ठाएं तो अमरबेल सी
लिपट रहीं
मायावी इच्छाएं उर में
सिमट रहीं.
रीझ गया मन इंद्रजाल पर
यदि सखा !
प्रज्ञा हो अस्तित्वहीन
खो जाएगी.
‘भाग्य’ मृगतृष्णा-सा
‘सत्य’ कर्म है
तीव्र प्रवाहित जीवन का
‘प्रीत’ धर्म है .
लालच , ईर्ष्या , द्वेष
सँहारे नहीं गये तो
मीत ! सृष्टि अनुरक्तिहीन
हो जाएगी.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़ )
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)