सौगंधों के सूत्र बाँध कर
मत दो जीवन का वरदान
पतझर को पतझर रहने दो
मत दो सावन का वरदान............
अरी बावरी ! सुलग रहा हूँ
फूँको अब जल जाने दो
जल लहराया है नयनों में
मत पोंछो बह जाने दो.
तुम पारस मैं लौह अभागा
मत दो कंचन का वरदान.............
मेरे रोम-रोम में कंटक
वसन तुम्हारा बिंध जायेगा
कोमल तन की तुम शहजादी
रिश्ता कैसे निभ पायेगा.
मैं बबूल का सूखा पौधा
मत दो चंदन का वरदान...............
तुमसे रह कर विलग मीत मैं
मरुथल सा ही तृषित रहूंगा
तुम्हीं नहीं जब सुनने वाली
मैं मन पीड़ा किसे कहूंगा ?
मरुथल को मरुथल रहने दो
मत दो मधुबन का वरदान..........
पागल होकर गीत तुम्हारे
विजन घाटियों में गाऊंगा
रुदन करूंगा – चीखूंगा मैं
और भटक कर मर जाऊंगा.
क्रंदन मेरे भाग लिखा है
मत दो जीवन का वरदान..........
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छत्तीसगढ़.
(रचना वर्ष- 1977)