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Sunday, August 12, 2012

चाँद , उमर के साथ दिखाये , प्राणप्रिये


चंदा- मामा  पुए  पकाए   , प्राणप्रिये
बचपन में  हर बच्चा खाये ,प्राणप्रिये |
दूध - कटोरी डाल बताशा अम्मा जी
लल्ला लल्ला लोरी गाये ,प्राणप्रिये |

तरुणाई की  अरुणाई दृग में उतरी
हर सूरत में चाँद दिखाये प्राणप्रिये |
सजनी लिखती मन की पाती मेंहदी से
चंदा साजन तक पहुँचाये प्राणप्रिये |

दम भर चंदा इधर,उधर मुँह फेर थका
नर्गिस ने  क्या  राज  सुनाये प्राणप्रिये |
दो - दो चाँद खिले हैं ,एक है बदली में
दूजा ,  घूँघट  में  शरमाये  प्राणप्रिये |

नून-तेल का चक्कर जब सिर पर छाया
चाँद  नजर  रोटी  में  आये प्राणप्रिये |
दाग  दिखाई   देते   हैं   अब  चंदा  में
मांगने  जब कोई चंदा आये प्राणप्रिये |

चमक उठी है चाँद, हटा कर केश घटा
अकलमंद अब हम कहलाये प्राणप्रिये |
अब भी हो तुम चाँद न यूँ छेड़ो मुझको
फिर आंगन दो चाँद समाये प्राणप्रिये |

चंदा - तारे , साथ  छोड़  परदेस  गये
तन्हा रह गये, सपन सजाये प्राणप्रिये |
चाँद – सरीखी  वृद्धावस्था  रोती  है
अब  आँखों को चाँद न भाये प्राणप्रिये |

अरुण कुमार निगम
आदित्यनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्ट्मेंट, विजय नगर
जबलपुर (म.प्र.)

(ओपन बुक्स ऑन लाइन महाउत्सव में सम्मिलित रचना)