मन की छुअन तन की छुअन
भावना की आँधियाँ भावना की आँधियाँ
अब थम चली यौवन बनी
मर्म-सिंधु में छिपी पूर्ण इंदु सी सजी
इक सीप को इस देह को
छू लिया तुमने सहज छू लिया मैंने सहज
बंद पलकें खुल उठी झुक गई पलकें तुम्हारी
उस सीप की और उष्मा देह की
लिखने लगी लिखने लगी
मन के पृष्ठों पर तन के पृष्ठों पर
अकिंचित “प्यार” “स्वीकार”
बूँद आशा की प्रतीक्षा में सदा तुम कलि थी सर्वदा ही अधखिली
बंधन खुले खुल गये थे आवरण लाज के
बूँद मोती बन गई और सिमटी सी तुम्हारी देह पर
विश्वास की नृत्य कर बैठे अधर
और यह विश्वास ही क्या यहाँ भी प्रेम था
पर्याय है प्रेम का उन्मुक्त मंजुल प्रेम था
उन्मुक्त मंजुल प्रेम का या कोरी कामना
श्वाँस में सरगम श्वाँस में उष्मा
हृदय की धड़कनों में हृदय की धड़कनों में
प्रेम का संगीत महका आग भड़की
उन क्षणों उन क्षणों
तम के सीने में अचानक तन में जागी थी अचानक
आ गई जैसे किरण इक जलन
वाह ! शीतल है अति उफ् जला देती हमें
मन की छुअन. तन की छुअन.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)