छंद - दुर्मिल सवैया
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मन की
सुनिये मन से लिखिये, बरखा बन मुक्त झरे कविता
जन -
मानस के मन में पहुँचे , तुलसी सम रूप धरे कविता
यह
मन्त्र बने सुख - यंत्र बने , सब दु:ख समूल हरे कविता
इतिहास गवाह
रहा सुनिये , युग में बदलाव करे
कविता
अरुण
कुमार निगम
आदित्य
नगर,दुर्ग [छत्तीसगढ़]