तुम्हीं प्रेरणा कवि ह्रदय की
कविता का अधिकार न छीनो
तुम पर ही अब गीत रचूंगा
मुझसे यह अधिकार न छीनो.
सावन बनकर छा जाओगे
ह्रदय पपीहा नृत्य करेगा
घुंघरू तो टकरायेंगे ही
तुम इनकी झंकार न छीनो.
जब ऋतुराज विहँस आयेगा
कलम-कोकिला कूक उठेगी
वरना होगा केवल पतझर
तुम इनका अभिसार न छीनो.
बिना छिद्र बाँसुरिया कैसी
बिना साधना कैसी सरगम
बिना प्रेरणा के कवि कैसा
वीणा से तुम तार न छीनो.
कहीं भावना की आँधी से
सौगंधों का बाँध न टूटे
अरी बावरी ! हठ छोड़ो तुम
जीवन का आधार न छीनो.
कठिन साधना के प्रतिफल में
तुमसे निश्छल प्यार मिला है
जीवन छीनो , धड़कन छीनो
तुम अपना उपहार न छीनो.
जलने दो तुम “अरुण – हृदय” को
तब ही जग आलोकित होगा
आदिकाल से नियति यही है
तुम मेरे संस्कार न छीनो.
-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग
(छत्तीसगढ़)