बहर
221 1222, 221 1222
कुछ काम नहीं करता, हर बार मिली कुर्सी
मंत्री का भतीजा है, उपहार मिली कुर्सी।।
गत सत्तर सालों में, कई रोग मिले तन को
जाँचा जो चिकित्सक ने, बीमार मिली कुर्सी।।
पाँवो को हुआ गठिया, है पीठ भी टेढ़ी-सी
लकवा हुआ हाथों को, लाचार मिली कुर्सी।।
फिर भी इसे पाने को, हर शख्स मचलता है
सेवा तो बहाना है, व्यापार मिली कुर्सी।।
कुछ पा न सके इसको, इक उम्र गँवा के भी
कुछ खास घरानों में, अधिकार मिली कुर्सी।।
है नाव सियासत की, उस पार खजाना है
जो लूट सके लूटे, पतवार मिली कुर्सी।।
जनता के खजाने को, क्या खूब लुटाती है
कहता है "अरुण" दिल से, दिलदार मिली कुर्सी।।
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
221 1222, 221 1222
कुछ काम नहीं करता, हर बार मिली कुर्सी
मंत्री का भतीजा है, उपहार मिली कुर्सी।।
गत सत्तर सालों में, कई रोग मिले तन को
जाँचा जो चिकित्सक ने, बीमार मिली कुर्सी।।
पाँवो को हुआ गठिया, है पीठ भी टेढ़ी-सी
लकवा हुआ हाथों को, लाचार मिली कुर्सी।।
फिर भी इसे पाने को, हर शख्स मचलता है
सेवा तो बहाना है, व्यापार मिली कुर्सी।।
कुछ पा न सके इसको, इक उम्र गँवा के भी
कुछ खास घरानों में, अधिकार मिली कुर्सी।।
है नाव सियासत की, उस पार खजाना है
जो लूट सके लूटे, पतवार मिली कुर्सी।।
जनता के खजाने को, क्या खूब लुटाती है
कहता है "अरुण" दिल से, दिलदार मिली कुर्सी।।
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)