सुविधाओं की भाग-दौड़ में
सुख का है अस्तित्व खो गया
देह सिर्फ रह गई व्यक्ति की
पूरा ही व्यक्तित्व खो गया.
धन-दौलत , ओहदे की चाहत
प्रीति नीति इस युग में आहत
वैभव की छीन-झपटी में
रिश्तों का स्वामित्व खो गया.
आया, झूलाघर की सुलभता
एकल परिवारों की विवशता
बड़े – बुजुर्गों से दूरी में
पहले-सा अपनत्व खो गया.
आज के संग में कानाफूसी
कल था कितना दकियानूसी
अधिकारों के राजपाट में
देखो अब दायित्व खो गया.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
विजय नगर , जबलपुर ( मध्य प्रदेश )