अच्छे दिन :
कब लौटेंगे यारों
अपने , बचपन वाले अच्छे दिन
छईं-छपाक, कागज़ की कश्ती, सावन वाले अच्छे दिन
गिल्ली-डंडा, लट्टू चकरी , छुवा-छुवौवल, लुकाछिपी
तुलसी-चौरा, गोबर लीपे आँगन वाले अच्छे दिन
हाफ-पैंट, कपड़े का बस्ता, स्याही की दावात, कलम
शाला की छुट्टी की घंटी, टन-टन वाले अच्छे दिन
मोटी रोटी, दाल-भात में देशी घी अपने घर का
नन्हा-पाटा, फुलकाँसे के बरतन वाले अच्छे दिन
बचपन बीता, सजग हुये कुछ और सँवरना सीख गये
मन को भाते, बहुत सुहाते, दरपन वाले अच्छे दिन
छुपा छुपाकर नाम हथेली पर लिख-लिख कर मिटा दिया
याद करें तो कसक जगाते, यौवन वाले अच्छे दिन
निपट निगोड़े सपने सारे , नौकरिया ने निगल लिये
वेतन वाले से अच्छे थे, ठन–ठन वाले अच्छे दिन
फिर फेरों के फेरे में पड़ , फिरकी जैसे घूम रहे
मजबूरी में कहते फिरते, बन्धन वाले अच्छे दिन
दावा वादा व्यर्थ तुम्हारा , बहल नहीं हम पायेंगे
क्या दे पाओगे तुम हमको, बचपन वाले अच्छे दिन
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (chhattiछत्तीसगढ़)