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Wednesday, March 21, 2012

दिल जोड़ना ही सीखा.............


(ओबीओ तरही मुशायरा में शामिल गज़ल)

इक रोज रख गये थे वो दिल की किताब में
ताउम्र  बरकरार  है  खुशबू  गुलाब  में.

कच्ची उमर की हर अदा ओ चाल नशीली
वो मस्तियाँ ना मिल सकीं कच्ची शराब में.

दोनों रहे गुरूर में हाय मिल नहीं सके
मैं रह गया रुवाब में और वो शवाब में.

आईना तोड़ देते हैं वो खुद को देख कर
वो कुछ दिनों से दिख रहे अक्सर हिजाब में

कमबख्त नौकरी ने यूँ मजबूर कर दिया
बीबी से मुलाकात भी होती है ख्वाब में.

हुश्नोशवाब पर तो गज़ल  खूब लिखी हैं
रोटी ही नजर आती है अब माहताब में .

दिल जोड़ना ही सीखा, धन जोड़ ना सके
नाकाम रह गये जमाने के हिसाब में.

पहले से खत जवाबी लिखके भेज दे अरुण
"मैं  जानता हूँ जो वो लिखेंगे  जवाब में"

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)