मैं धूल हूँ , तुम चंदन रोली
तुम दीवाली , मैं हूँ होली
तुम ज्योति , मैं हूँ अंधकार
मैं अर्थी हूँ , तुम हो डोली.
तुम प्राची की ऊषा – लाली
मैँ क्षितिज – अरुण अस्ताचल का
तुम दाग से बच कर चलती हो
मैं दाग किसी के काजल का.
मिलन कहाँ ? अब तुम्हीँ कहो
तुम स्नेह-सुधा , मैं विष-प्याला
विस्मृत कर दो अब मुझे प्रिये
तुम गंगाजल , मैं मधुशाला.
मणिकांचन जीवन का आंगन
जीवन का आसव है तुमसे
मैं मृत्यु-पुजारी हूँ मेरा
मिलन असम्भव है तुमसे.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर ,दुर्ग
(छत्तीसगढ़)
{रचना वर्ष – 1978}